लेखक : रमज़ान अली, सांगली (महाराष्ट्र)
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,नदी (River) जमीन के किसी एक हिस्से से निकलकर, जहां-जहां तक बहती जाती है, वहां-वहां की जमीन को जिन्दा करती है- हरीयाली बनाती है और जिस बस्ती-गांव-शहर से बहती जाती है, वहां के लोगों को जीवन प्रदान करती है । इसमे एक बात सामान्य-एक जैसी है, वोह यह की नदी एक होती है मगर जिस बस्ती-गांव-शहर से बहती है, उसे लोग अपने गांव-शहर की नदी कहते है ।
कोई यह नहीं पूछता की नदी का स्रोत (Source) कहां से है? वो लोग तो अपने गांव की नदी कहने में गर्व करने से चूकते नहीं । शहीद इमाम हुसैन का व्यक्तित्व भी कुछ नदी जैसा ही है । हुसैन की शहादत का उद्देश्य जहां-जहां तक पहुंचा, वहां-वहां के लोगों के ज़मीर को जिन्दा कर दिया और लोगों को नया जीवन दिया ।
मुन्शी प्रेमचंदजी लिखते है दुनिया जिस समानता और बंधुत्व की गुत्थी सुलझाने का प्रयास कर रही है, उसे इमाम हुसैन ने अपने अभियान और सत्याग्रह द्वारा सातवी सदी में ही सुलझा दिया था । उसके लिये ’करबला’ में हुसैन की शहादत संसार (दुनिया) की सबसे महान और प्रमाणित ऐतिहासिक घटना है संक्षेप में यही है की, हुसैन की शहादत और उनके व्यक्तित्व में मानव समुदाय के प्रति दर्द (empathy) प्रतित होता है।
बहुतसी अच्छाईयाँ ऐसी हैं जो सभी संप्रदाय/समुदाय अपनाते हैं । जैसे - सच्चाई, न्याय, आज़ादी और मानवता सभी समुदाय में केवल अच्छाईयाँ नहीं बल्की उच्च चरीत्र समजी जाती है । तो फिर ऐसी अच्छाईयाँ पुनर्जीवित करने, पूनः प्रस्थापित करने के लिये; तानाशाह ‘यजीद’ की अन्यायी नीतियों के विरोध में सत्याग्रह करते शहीद होनेवाले ‘हुसैन किसी एक समुदाय के कैसे हो सकते है ? हुसैन ने शहीद होकर जनकल्याण का उद्देश्य साध्य किया, जो मानवता के लिये समानता, स्वतंत्रता और न्याय पर आधारीत है ।
डॉ. क्रिस ह्युअर अपनी किताब "Husain and Struggle for Justice" में लिखते है की ‘एक शहीद के रूप में विख्यात ’हुसैन’ ने सदीयों से दुनियाभर में लोगों को सच्चाई, न्याय, निर्भय और सम्मान की गरीमा के साथ जीने के लिये प्रेरीत किया है ।
इस विवेचना का निष्कर्ष यही है कि हुसैन की शहादत केवल मोहर्रम की 10 तारीख (आशुरा) के वक्त के लिये सीमित नहीं थी बल्की हमेशा के लिये लोगों को, अच्छाईयों को अपनाने और बुराईयों से दूर रहने के लिये प्रवृत्त और सक्षम करने के लिये थी ।
'Imam Husain' was the Symbol of Truth - Freedom and Secrifice
for all Mankind --Shri Ravindranath Tagore..
हुसैन के व्यक्तित्व और हुसैन की शहादत की घटना के बारेमे जिसको जो भी जानकारी प्राप्त हुई है, जो समज और सोच उनकी है, उसके अनुसार लोगों मे हुसैन के प्रति आदर है । जब कि हुसैन सार्वकालिक/सर्वकालीन है और हर जगह प्रासंगिक है । व्यक्ति के जीवन में, हर मुल्क/राष्ट्र में, हर काल में हमेशा है । हुसैन जहां मुस्लिम शासक ‘यजीद’ की अन्यायी नीतियों के विरोध में सत्याग्रह करते बिनसंप्रदायी भाव में दिखाई देते है, वहां बंदगी/भक्ति की हालत में शहीद होते हुवे धार्मिक भी दिखाई देते है ।
हुसैन ज्ञान-शिक्षा की बात करते हुवे दिखाई देते है, तो हुसैन केवल एक व्यक्ति नही बल्की सत्याग्रही समूह के रूप में दिखाई देते हैं । हुसैन अलौकिक छबीसे परे दिखाइ देते हैं, हुसैन बहुतसी मायनो (Sence) में अपने काल/वक्त का प्रतिनिधित्व करते थे । उनकी सबसे बड़ी उपलब्धी मे से एक उपलब्धी यह थी कि उन्होंने अपने काल/वक्त को समजा और मानवहीत के संदर्भ में जो जरुरतें थी/अपरीहार्य था, उसे पूरा किया । न्याय और इन्साफ को विश्वव्यापी श्रेणी में प्रचलित (Prevalent) करने में हुसैन कामयाब/सफल रहे, जब की उस दौर (इस. 680) में इस सिद्धांत के अनुयायी बहुत कम थे।
फिरभी हुसैन ने इस नैतिक अवधारणा (Concept) को सूत्रबद्ध (Formulate) किया । जिसका असर आजतक देखा जा सकता है । लोगों को हुसैन कई रूप में दिखाई देते हैं । किसी को मानवता का मसीहा तो किसी को विश्व का पहला सत्याग्रही तो किसी को ज्ञान, कर्म, भक्ति और राज योग में दिखाई देते हैं । हुसैन एक संघर्षरत इन्सान है, जो शहीद हो जाते हैं, तो मर के बताते है ।
हुसैन की शहादत केवल एक दर्दभरी घटना नहीं है बल्की हुसैन की शहादत में इन्सानी जिन्दगी के DNA समाये हुए हैं । इसी कारण हुसैन की शहादत और उनके सत्याग्रह की सफलता का संवाद दुनिया 1346 वर्षों से करती आ रही है । ‘एन्टोनी बारा’ एक विचारक और लेखक अपनी किताब में लिखते है, ‘इमाम हुसैन पूरी दुनिया के है ।’ इस विश्लेषण से यह प्रतित होता है कि ’शहीदे इन्सानियत के रूप में इमाम हुसैन सबके है ।
इमाम हुसैन की सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक प्रतिभा, उनके त्याग और करबला की घटना के माध्यम से युगों-युगों के लिए एक मिसाल बन गई है । उनकी वीरासत केवल धार्मिक नहीं बल्की नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक सूधारों का एक गहरा दस्तावेज है।
यजीद के साम्राज्य में मानवीय मूल्यों की धज्जींयाँ उड रही थी, दुर्जनों को सम्मानित तो सज्जनों को दंडित किया जाता था । यजीद के साम्राज्य में मुस्लिम बहुसंख्य तो ज्यु, क्रिश्चन और अन्य संप्रदाय अल्पसंख्यकमें थे, उन सबके जमीर मर चुके थे । ऐसे समय हुसैन अपने वतन ’मदीना’ मे अच्छाईयों को अपनाने और बुराईयों से दूर रहेने का अभियान चला रहे थे ।
यजीद ने स्वयं को मुस्लिमों का तथाकथित खलीफा घोषित किया, तो बहुत से लोगों ने विरोध किया । यजीद ने साम-दाम-दंड-भेद से विरोध दबा दिया । कुछ विरोधक भूमीगत हो गये मगर हुसैन ने विरोध जारी रखा, खलीफा नहीं माना । हुसैन ने अपने 72 साथियों के साथ करबला में सत्याग्रह शुरु किया ।
यजीद ने हुसैन के सत्याग्रही पडाव में खाने-पीने की रसद पहोचने के मार्ग बंद कर दिये । तीन दिन के भूखे-प्यासे हुसैन के सत्याग्रही पडाव पर यजीद की सेनाने हमला कर दिया । हुसैन और उनके 72 साथी प्रतिकार करते शहीद हो गये, जिसमे हुसैन के परीवार के 18 सदस्य थे।
हुसैन की शहादत ने लोगों के जमीर को जिन्दा कर दिया; हर जगह यजीद के विरोध में लोग खडे हो गये, और केवल दो वर्ष के कालविधी मे यजीद के शासन को जनता ने उखाड फेका । यह हुसैनी क्रांति थी; जिससे प्रेरीत होकर फ्रान्सीसी क्रांति ने जन्म लिया । हुसैनी क्रांति ने यूरोप और एशिया के जन-जीवन और राजनीतिक विचारों की दिशा बदल दी । सत्यमेव जयते !
रमज़ान अली
सांगली (महाराष्ट्र)
26.06.2026
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